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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

नाहं दुःखी न मे देहो बन्धः कस्यात्मनः स्थितः । इति भावानुरूपेण व्यवहारेण मुच्यते ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

बन्धन से मोक्ष पाने की उपाय भ्रूत कल्पना को दिखलाते है। न मैं दु:खित हूँ, न मेरी देह है, बन्धन किस आत्मा को प्राप्त हो सकता है, इस भावना के अनुरूप व्यवहार से जीव को मुक्ति प्राप्त होती है