Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
प्रोत्तुङ्गसुरशैलाग्रवैदूर्यशिखरप्रभा ।
अथवार्कांशुदुर्भेदा तिमिरश्रीः स्थितोपरि ॥ ३२ ॥
कल्प्यते हि यथा व्योम्नः कालिमेति स्वभावतः ।
पुंसा धरणिसंस्थेन स्वसंकल्पनयेद्धया ॥ ३३ ॥
कल्पितैवमविद्येयमनात्मन्यात्मभावना ।
पुरुषेणाप्रबुद्धेन न प्रबुद्धेन राघव ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या आदि कल्पनाओं के दूसरे दृष्टान्त कहते हैं ।
हे रघुवर, जैसे पृथिवी तल पर खड़ा हुआ पुरुष बढ़ी-चढ़ी अपनी कल्पना से अत्यन्त
ऊँचे सुमेरु पर्वत के अगले हिस्से के नीलमणि के शिखरोंकी कान्ति की अथवा सूर्यकिरणों से
जिसका भेदन नहीं हो सकता ऐसी आकाश के ऊपर स्थित अन्धकार राशि की आकाश की
स्वाभाविक कालिमा के रूप से कल्पना करता है, वैसे ही अज्ञानीजनों ने अनात्मामें
आत्मभावनारूप इस अविद्या की कल्पना की हे, प्रबुद्ध पुरूषों ने नहीं की है