Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
खाद्व्यब्ध्युर्वीनदी सेयं याऽविद्याऽज्ञस्य राघव ।
नाविद्या ज्ञस्य तद्ब्रह्म स्वमहिम्ना व्यवस्थितम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानी की दृष्टि में यह अविद्या नहीं है ।
आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथिवी, नदीरूप जो यह अविद्या है, वह अज्ञ के लिए है । ज्ञानी की
दृष्टि में तो आकाश आदि रूपसे ब्रह्म ही अपनी महिमा से स्थित हे