Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 76–77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 76–77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 76,77
संस्कृत श्लोक
तिष्ठतस्तव कार्येषु मास्तु रागेषु रञ्जना ।
स्फटिकस्येव चित्राणि प्रतिबिम्बानि गृह्णतः ॥ ७६ ॥
विदितकौतुकसङ्घसमिद्धया यदि करोषि सदैव सुशीलया ।
वरधिया गतप्राकृतिकक्रियस्तदसि केन सहानुपमीयसे ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यवहार के कार्य कर रहे आपकी अनुराग के विषयों में
आसक्ति न हो, जैसे कि विचित्र प्रतिबिम्बो का ग्रहण कर रहे स्फटिक की रंग के विषय में
आसक्ति नहीं होती | हे रामचन्द्रजी, निरतिशयानन्दरूप होने से परम कौतुकमय ब्रह्म का
जो साक्षात्कार कर चुके हैं यानी जो तत्त्वज्ञ हैं, उनकी संगति में पुनः-पुनः विचार करने से
दीप्त हुई, अतएव सर्वत्र समदर्शन आदि सुशीलवाली असंग बुद्धि से यदि आप सदा व्यवहार
करते हैं, तो आप अविद्याप्रयुक्त जन्म, मरण आदि भ्रमों से रहित हैं यानी नित्यमुक्त स्वरूप
हैं। तब आपकी किसी जीवन्मुक्त महाभाग्य ब्रह्मा, विष्णु अथवा शंकरजी के साथ तुलना
नहीं हो सकती है