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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 116, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

राजसूयस्य कर्तारो ये हि ते द्वादशाब्दिकम् । आपद्दुःखं प्राप्नुवन्ति नानाकारव्यथामयम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

राजसूययज्ञ करनेवाले लोग बारह वर्षतक आपत्ति रूप दुःख को प्राप्त होते हैं, जिसमें विविध प्रकार की व्यथाएँ होती हैं