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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

पार्श्वस्थबोधिताः सन्तः सर्वाचारक्रमागतम् । आचारमाचरन्त्येव सुप्रबुद्धवदक्षतम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

करते हैं या नहीं भी करते, इस कथन से किसी को उनके यथेष्टाचार की शंका न हो जाय, इसलिए यथेष्टाचार की शंका का खण्डन करते हुए अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं । पूर्वोक्त महात्मा पास में स्थित पुरुषसे बोधित होकर तत्‌-तत्‌ आश्रमों में स्थित पुरुषों के आचारक्रम से प्राप्त हुए सदाचार का ही आचरण करते है, जो कि फल की आसक्ति से दूषित नहीं रहता है। तात्पर्य यह निकला कि उक्तपुरुषों की यथेष्टाचार में आसक्ति नहीं हो सकी । कहा भी है : “विदितब्रह्मतत्वस्य यथेष्टाचरणं यदि । शुनां तत्त्वविदां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे ॥ (यदि तत्त्वज्ञानियों की यथेष्टाचार मेँ प्रवृत्ति हो, तो कुत्तों और तत्त्वज्ञानियों के अपवित्र पदार्थ के भक्षण में कौन भेद होगा ?)