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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 119, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एवं चेत्तत्त्प्रभो किं स्यादूर्मिकात्वं तु कीदृशम् । अनयैवार्थनिश्चित्या ज्ञास्यामि ब्रह्मणो वपुः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, यदि सुवर्ण ही खरीदना, बेचना आदि सम्पूर्ण व्यवहारों का विषय है, तो उसमें प्रतीत हो रहे अँगूठी आदि के आकार का सुवर्ण से अतिरिक्त क्या स्वरूप होगा ओर वह किस प्रकार होगा, जो कि अँगूठी आदि शब्दों से कहा जाता है। इसके निश्चय से मैं ब्रह्म के स्वरूप को जान जाऊँगा