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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 119, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

यः शुक्तौ रजताकारं प्रेक्षते रजतस्य सः । न संप्राप्नोत्यणुमपि कणं क्षणमपि क्वचित् ॥ ९ ॥ अपर्यालोकनेनैव सदिवासद्विराजते । यथा शुक्तौ रजतता जलं मरुमरीचिषु ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष सीप में चाँदी से आकार को देखता है, वह चाँदी के अणुमात्र कण को एक क्षण के लिए भी कहीं पर नहीं प्राप्त करता है। जैसे सीप में चाँदीपना और जैसे मरूभूमि में जल अविचार से ही प्रतीत होता है, वैसे ही असद्वस्तु ही अविचार से सत्‌-सी प्रतीत होती है