Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
एवंप्रायात्मिका संविद्बीजं संकल्पशाखिनः ।
भवत्यहंकारकणस्ततः स्पन्दतया मरुत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
“मैं आकाश होऊँ ' इस अहंकार से (अभिमान से) जिसका स्वरूप प्रायः आकाश-सा
हो जाता है ऐसी संवित् आकाशकार्य (वायु आदि) विषयक संकल्परूपी वृक्ष की बीज हे ।
अतएव उससे परिच्छिन्न स्पन्दशक्तिप्रधान होने के कारण अहंकार का एक अंश-सा वायु
आविर्भूत होता है