Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 12, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 12, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
विवर्तमेव धावन्ति निर्विवर्तानि सन्ति च ।
चिद्वेधितानि सर्वाणि क्षणात्पिण्डीभवन्ति च ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तन्मात्राओं के उक्त रीति से स्थूल हो जानेपर भी उनके यूक्ष्म-रूप की क्षति नहीं होती,
क्योकि जिस अधिष्ठान में विवर्त होता है, उसका विकार नहीं होता, ऐसा कहते हैं।
वे विवर्त की ओर अग्रसर होते हैं यानी विवर्त से स्थूलता को प्राप्त होते हैं, पर वास्तव
में विवर्तरहित अपने सूक्ष्मतम स्वरूप में ही रहते हैं विकाररहित चेतन से सम्बद्ध होने के
कारण क्षण में ही पिण्डीभाव (स्थूलता) को प्राप्त होते हैँ । यदि यह स्थूलभाव तन्मात्राओं
का परिणाम होता, तो जैसे कद्दू के बड़े होने में समय लगता है, वैसे ही इनकी स्थूलता
में समय लगता, यह भाव है