Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 120, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 120, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 120 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तालीदलालम्बनमम्बुदाद्रौ दन्तान्तरस्थारुणसत्फलस्य ।
स्मरामि गुञ्जाफलदाम भर्तुः पुरस्थमुद्रामरहासिनस्ते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय राजा लवण के करम्ब के पोषण के लिए किये गये साहस कर्मका स्मरण करती
हुई कहती है ।
हे पुत्र, मेघ की नाई ऊँचे पहाड़ पर ताड के पेड पर चढ़कर ओर उसके फल को लेकर
उतरते समय दोनों हाथों के अन्य का्यमिं लगने यानी खाली न रहने के कारण फल को लेने
में असमर्थ होने से, जिसने दाँतों के बीच में लाल पके हुए फल को रक्खा था, अतएव उस
समय प्राप्त हुए वेष से श्रहनुमान्जी का अनुकरण करनेवाले तथा गुंजा के फलों की माला
को धारण करनेवाले तुम्हारे अभाग्यवश फिसलने पर निकटवर्ती दूसरे ताल की शाखा का
अवलम्बनरूप साहस का मुझे स्मरण होता है