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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

नाविद्या विद्यते किंचित्तैलादि सिकतास्विव । हेम्नः किं कटकादन्यत्पदं स्याद्धेमतां विना ॥ ३२ ॥ अविद्ययात्मतत्त्वस्य संबन्धो नोपपद्यते । संबन्धः सदृशानां च यः स्फुटः स्वानुभूतितः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

क्या इस तरह का व्यवहार अत्यन्त असत्‌ है ? इस शंका पर “नहीं ऐसा कहते हैं। उस व्यवहारदशा की सत्ता भी प्रतिभास से ही है । अधिष्ठान चेतन की सत्ता से ही सब वस्तुओं की सत्ता है, स्वतन्त्र किसी की सत्ता नहीं है, इस आशय से कहते हैं। सब पदार्थों की सत्ता अधिष्ठानभूत चेतनसत्ता से अतिरिक्त नहीं है । अधिष्ठान चेतन की सत्ता ही भूत, वर्तमान तथा भविष्य के प्रपंचो में व्याप्त हुई इस तरह अधिष्ठानसत्ता से भिन्न भासित होती है, जिस तरह जल में तरंग तथा बीज में वृक्ष उससे भिन्न भासते हैँ ॥ ३ ०॥ अधिष्ठानसत्ता से भिन्‍न जो पदार्थों की सत्ता है उसकी सत्यता और असत्यता न सत्‌ है, और न असत्‌ है, यह निश्चित है, क्योंकि श्रुति ने “न तत्‌ सदासीत्‌ नोड्सदासीत्‌* कहा है। सत्त्व के संवेदन से वह सत्‌ है तथा सत्त्व के असंवेदन से वह असत्‌ है । उसकी सत्ता और असत्ता भ्रान्ति ओर संवेदन के अधीन हैं, यह अर्थ है ॥३ १॥ भ्रम का विषय अविद्यामात्र है, इसलिए फलत: असत्य ही है, इस आशय से कहते हैं। वस्तुतः अविद्या कोई वस्तु नहीं हे जैसे कि बालू में तेल आदि वस्तु नहीं हे । क्या सुवर्ण का कटक (ककण) सुवर्णं से अतिरिक्त कोई वस्तु है ? अर्थात्‌ कुछ नहीं हे ॥