Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
दृग्दर्शनपरित्यागे नाविद्यास्ति पृथक्सदा ।
कटकादिमहाभेदमेकं हेम यथामलम् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कटक आदि बड़े भेदवाला सुवर्ण भेददृष्टि और
भेददर्शन का त्याग करने पर एकमात्र निर्मल सुवर्ण ही है यानी उसकी पृथक् सत्ता नहीं है, वैसे
ही द्रष्टा और दर्शन का परित्याग होने पर अविद्या पृथक् नहीं हैं