Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
संबन्धे दृश्यदृष्टीनां मध्ये द्रष्टुर्हि यद्वपुः ।
द्रष्टृदर्शनदृश्यादिवर्जितं तदिदं परम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
घट आदि पदार्थों में अनुस्यूत सारभूत मिद्धीस्वरूप के तुल्य द्रष्टा आदि त्रिपुटी में अनुस्यूत
साक्षी चिन्मात्र को त्रिपुटी के निराससे दिखाते हैं ।
द्रष्टा का दृश्य और दर्शन के साथ सम्बन्ध होने पर फूलों में सूत्र की तरह सबके मध्य में
अनुगत द्रष्टा, दर्शन और दृश्य से वर्जित जो द्रष्टा का शुद्ध रूप हे, वही इस त्रिपुटी में व्याप्त
परब्रह्म हे । इस वाक्य से अखण्य वाक्यार्थ दिखलाया गया है, ऐसा समझना चाहिए