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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 121, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

अजाग्रत्स्वप्ननिद्रस्य यत्ते रूपं सनातनम् । अचेतनं चाजडं च तन्मयो भव सर्वदा ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

जाग्रत, स्वप्न ओर सुषुप्ति- इन तीन अवस्थाओं से रहित चित्तवृत्ति से शून्य जो आपका सनातन शुद्ध चेतन रूप है, उसमें आप तन्मय होइये