Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अबन्धुरपि कस्मात्त्वं बन्धुदुःखानि शोचसि ।
अद्वितीये स्थिते ह्यस्मिन्बान्धवाः क इवात्मनि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे, आत्मबोध से जन्म-मरण आदि से होनेवाले शोक पर भले ही विजय
प्राप्त हो जाय, किन्तु बन्धु-बान्धवों के संग से होनेवाले शोक पर कैसे विजय प्राप्त की जा
सकती है, इस पर कहते हैं।
आपके कोई बन्धु नहीं हैं, फिर क्यों आप बन्धु से उत्पन्न दुःख के लिए शोक करते हैं ?
यह आत्मा अद्वितीय है, इसमें बन्धु-बान्धवों का अवसर ही कहाँ ?