Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verses 34–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verses 34–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 34-36
संस्कृत श्लोक
स एव सर्वभूतानामात्मा ब्रह्मेति कथ्यते ।
तस्मिञ्जाते जगज्ज्ञातं स ज्ञाता भुवनत्रये ॥ ३४ ॥
शास्त्रसंव्यवहारार्थं तस्यास्य वितताकृतेः ।
चिद्ब्रह्मात्मेति नामानि कल्पितानि कृतात्मभिः ॥ ३५ ॥
विषयेन्द्रियसंयोगे हर्षामर्षविवर्जिता ।
सैषा शुद्धानुभूतिर्हि सोऽयमात्मा चिदव्ययः ॥ ३६ ॥
आकाशातितराच्छाच्छ इदं तस्मिंश्चिदात्मनि ।
स्वाभोग एव हि जगत्पृथग्वत्प्रतिबिम्बति ॥ ३७ ॥
बुद्धिस्तद्व्यतिरेकेण लोभमोहादयो हि तान् ।
पात्यसद्व्यतिरेकेण ते च तस्मिंस्तदेव ते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे तेज से प्रकाश उत्पन्न होता है, वैसे ही
कल्याणमय, रूपरहित, अप्रमेय, निर्दोष ब्रह्म से सब भूत उत्पन्न हुए हैं । जैसे पत्ते में विविध
रेखाएँ होती हैं, जैसे जल में अनेक लहरें उठती हैं, जैसे सुवर्ण में कटक आदि का आविर्भाव
होता है और जैसे अग्नि में उष्णता आदि धर्म होते हैँ, वैसे ही वासनाअवच्छिन्न ब्रह्म में यह
सारा त्रिलोक स्थित है, उसी से उत्पन्न हुआ है ओर तद्रूप ही है ॥ ३ १-३ ३॥ वही सब भूतों का
आत्मा ब्रह्म कहा जाता है, उसका ज्ञान होने पर सारे जगत् का ज्ञान हो जाता है। तीनोंलोकों
में वही ज्ञाता है, क्योंकि “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा (उससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है) ऐसी श्रुति
है। शास्त्रोपदेश आदि व्यवहार के लिए विद्वान् लोगों ने उसी सर्वव्यापक तत्त्व के चित्, ब्रह्मा
और आत्मा इत्यादि नामों की कल्पना की है । प्रिय और अप्रिय विषयोंका इन्द्रियो के साथ
कभी संयोग होने पर भी उनमें मिथ्यात्व बुद्धि होने के कारण हर्ष और शोक से रहित यह शुद्ध
जीन्मुक्तानुभूति ही वह प्रसिद्ध अविनाशी चिदात्मा हे । मूढ जिसका अनुभव करते हैं, ऐसा
संसार स्वभाववाला आत्मा नहीं है