Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
सत्तामात्रेण दीपस्य यथालोकः स्वभावतः ।
चित्तत्त्वस्य स्वभावात्तु तथेयं जागती स्थितिः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दीपक की केवल सत्ता से प्रकाश स्वभावतः होता है वैसे ही चित्तत्त्व की केवल सत्ता से
स्वभावतः जगत् की स्थिति होती है