Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
संकल्पसंक्षयवशाद्गलिते तु चित्ते संसारमोहमिहिका गलिता भवन्ति ।
स्वच्छं विभाति शरदीव खमागतायां चिन्मात्रमेकमजमाद्यमनन्तमन्तः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए निमित्त का नाश होने पर नैमित्तिक का भी नाश होने से निर्मल एकमात्र आत्मा ही
शेष रहता है, ऐसा कहते हैं ।
संकल्पो का क्षय होने से चित्त के नष्ट होने पर संसार मोह रूपी पाला नष्ट हो जाता है।
जैसे शरद् ऋतु आने पर आकाश स्वच्छ होता है वैसे ही चित्त के गलित होने पर अन्तःकरण
अद्वितीय जन्मरहित अनन्त प्रत्यगात्मस्वभाव हो जाता है