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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 122, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

असन्मयं सदिव पुरो विलक्ष्यते पुनर्भवत्यथ परिलीयते पुनः । स्वयं मनश्चिति चितसंस्फुरद्वपुर्महार्णवे जलवलयावली यथा ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए सम्पूर्ण दृश्य व्यष्टि-समष्टि भेद से कल्पित मनोमात्र ही है । मन अज्ञान कार्य होने से असत्‌ है । असत्‌ का ही अधिष्ठानभूत साक्षी की सत्ता और स्फूर्ति के बल से जो स्फुरण है, वह उत्पत्ति है, इस रीति से जगत्‌ के जन्म आदि विवर्तो की उपादानता ब्रह्म का तटस्थ लक्षण हुआ। उससे निष्प्रपव, सच्चिदानन्द, एकरस, पूर्ण्रह्म ही लक्षित होता है, जो परमा्थभरूत है । एसा सब सृष्टि श्रुतियों का तात्पयार्थि, यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते है । अज्ञानकार्यभूत मन स्वयं ही अपने अधिष्ठानभूत चैतन्य मेँ वृद्धि को प्राप्त होने से स्फुरित जगद्रूप से सामने विद्यमान सा साक्षी द्वारा दिखाई देता है। जैसे पूर्ण महासागर में उसकी सत्ता से ही सिद्ध हुई अपरिच्छिन्न जलपंक्तियाँ सामने दिखाई देती हैं, उत्पन्न होती हैं और लीन हो जाती है वैसे ही मन साक्षीभूत चेतन में स्वयं पुनःपुनः उत्पन्न होता है और लीन हो जाता है