Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 21–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 13, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
एक एव द्वितामेति स्वप्ने स्वमृतिबोधवत् ।
किंचित्स्थौल्यमिवादत्ते ततस्तारकतां विदन् ॥ २१ ॥
यथाभावितमात्रार्थभाविताद्विश्वरूपतः ।
स एव स्वात्मा सततोप्ययं सोहमिति स्वयम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में अपने मरणज्ञान के समान एक ही वह
चिदात्मा द्वितीयता को प्राप्त होता है, पूर्वोक्त अतिसूक्ष्म तेजःकणस्वरूपता का परित्याग कर
तारों के सदुश स्थूलता को माना प्राप्त करता है अर्थात् यही उसकी भूत तन्मात्राओं से संवलित
लिंगात्मता हे । संकल्पित अर्थ की भावना से तथा विश्वात्मक होने से “सोऽहम् इस प्रकार वह
तारकाकार आत्मा ही स्वात्मा हुआ