Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
सहकारिकारणानामभावे कार्यकारणम् ।
एकमेतदतो नान्यः परस्मात्सर्गविभ्रमः ॥ १३ ॥
ब्रह्मवाद्यो विराडात्मा विराडात्मेव सर्गता ।
जीवाकाशः स एवेत्थं स्थितः पृथ्व्याद्यसद्यतः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सहकारी कारणों के न रहने पर कार्य ओर कारण एक ही यानी अभिन्न ही रहता हे,
पृथक् नहीं, अतः सहकारी कारण से शून्य चैतन्य से जनित सर्गभ्रम भी परस्वरूप
(चैतन्यस्वरूप) ही है, उससे भिन्न नहीं है । ब्रह्म ही सर्वं प्रथम होनेवाला हिरण्यगर्भ हे,
हिरण्यगर्भ ही विराटात्मा है, विराट् ही सृष्टिस्वरूप है इस प्रकार से वह चिदात्मा जीवरूप से
स्थित है, जिससे असत् पृथिवी आदि उत्पन्न होते हैं अतः सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म के सिवा अन्य
कुछ नहीं है, यह भाव हे