Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
साऽबुद्धैव भवत्येवं भवेद्ब्रह्मैव बोधतः ।
अबोधः प्रेक्षया याति नाशं न तु प्रबुध्यते ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार से इसका (ब्रह्म का) विकास केवल अविद्या से ही होता है, स्वतः नहीं, अविद्या
की निवृत्ति हो जानेपर तो विक्षेपशून्य स्वरूपमात्र से इसकी अवस्थिति रहती है, ऐसा कहते हैं ।
उक्त ब्रह्मसत्ता में जब अज्ञानरूप आवरण रहता है, तब वह पूर्वकथनानुसार विविध
रूपों को प्राप्त होती है । बोध से तो वह ब्रह्म ही है। आत्मज्ञान से अज्ञान का विनाश हो जाता
है, पर आत्मज्ञान की प्राप्ति दुर्लभ हे