Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
सर्वानणुतया त्वस्य न क्वचिद्भेदकल्पना ।
विद्यते या हि कलना सा तदेवानुभूतितः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म सब प्रकार से देश, काल ओर परिमाण से अपरिच्छिन्न
है, अतः वास्तव में उसका कहीं पर भी भेद नहीं है और जो उसमें भेदकल्पना होती है, वह वही
है, उससे अतिरिक्त नहीं है, क्योकि ऐसा ही सर्वत्र अनुभव होता है, भाव यह है कि जैसे वन
के सम्पूर्ण वृक्षों को काट देने पर वृक्षों द्वारा प्रतीत होनेवाला प्रकाश का भेद चला जाता हे, वैसे
ही विषयभेद के हट जाने पर विषयभेद कल्पनाप्रयुक्त भेद भौ चला जाता हे