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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 31–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

पश्चाद्द्वित्वविभक्तानां स्वशक्तीनां प्रकल्पितः । अनेनेत्थं हि भवतीत्येवं तेन क्रियाक्रमः ॥ ३१ ॥ तं विनानुदये त्वासां प्रधानेच्छैव रोहति । शक्त्या ह्यजातया ब्राह्म्या नियमोऽयं प्रकल्पितः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य महर्षियों का भी तो, क्रियाक्रम के बिना, संकल्प से ही कार्य सम्पन्न होते देखा जाता है, सो कैसे ? उक्त क्रियाक्रम के बिना व्यष्टि जीवों के कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है, इस बात के निश्चित होने पर जो कहीं पर महर्षि आदि व्यष्टि जीवों की क्रियाक्रम के बिना इच्छा से ही कार्य की उत्पत्ति होती है, वहाँ पर प्रधान (समष्टिजीव) की ही इच्छा से कार्य होता है, इसका यह संकल्प सिद्ध हो, ऐसी प्रधान की ही इच्छा वहाँ पर हेतु होती है, यह भाव हे । यह नियम जन्मरहित ब्राह्मी शक्ति ने ही बनाया है