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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 40–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verses 40–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 40-42

संस्कृत श्लोक

चितो यस्माच्चिदालेहस्तन्मयत्वादनन्तकः । स एष भुवनाभोग इति तस्यां प्रबिम्बति ॥ ४० ॥ परिणामविकारादिशब्दैः सैव चिदव्यया । तादृग्रूपादभेद्यापि स्वशक्त्यैव विबुध्यते ॥ ४१ ॥ अविच्छिन्नविलासात्म स्वतो यत्स्वदनं चितः । चेत्यस्य च प्रकाशस्य जगदित्येव तत्स्थितम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

चिति का चमत्कार क्या है ? इस प्रश्न पर चमत्कार के विषय मे कहते हैं। जगत्‌ के संस्कार से संस्कृत (जगत्‌ की वासना से वासित) माया में प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण जगत्‌ की वासना से वासित माया के साथ एकरूप होकर चित्‌ का जो अपने स्वरूप का आस्वाद है, वही चित्‌-चमत्कार है ओर वही यह असीम भुवनविस्तार है, वह चिन्मय होने से आत्मचित्‌ में प्रतीत होता है चिति ने जिसका आस्वाद लिया, वह अविनाशिनी चिति यद्यपि वास्तविक चिति से भिन्न नहीं की जा सकती, फिर भी अपनी शक्ति से ही परिणाम, विकार आदि शब्दों से पुकारा जाता है अर्थात्‌ अज्ञानी जन उसे वास्तविक चित्‌ का परिणाम, विकार आदि समञ्जते हैँ । चिति द्वारा अपने स्वरूपभूत प्रकाश का ओर अपने द्वारा प्रकाशित होनेवाले विषयों का एकरूपता को प्राप्त जो स्वाभाविक आस्वादन है, वही जगत्‌" इस भ्रम से स्थित हे । भाव यह कि चिति अपना ओर चेत्य का स्वभाव से जो स्वाद लेती है, ऐसा स्वाद कि जिसमें चित्‌ ओर चैत्य का पार्थक्य तनिक भी प्रतीत नहीं होता, वही स्वाभाविक स्वाद भ्रान्तिवश जगत्रूप से प्रतीत होता है