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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

चितश्चेत्यमहंकारः सैव राघव कल्पना । तन्मात्रादि चिदेवातो द्वित्वैकत्वे क्व संस्थिते ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

चिति अहंकार की कल्पना करती है, अहंकार में तन्मात्रादिरूप जगत्‌ की कल्पना होती है। ऐसी परिस्थिति में जिससे दूसरे की कल्पना होती है, वही अवशिष्ट रहता है, ऐसा कहते हैं । हे रामचन्द्रजी, चित्‌ से अहंकार की कल्पना होती है और अहंकार से चेत्य की (तन्मात्रादि जगत्‌ की) कल्पना होती, ऐसी अवस्था में कल्पना चित्‌ से अतिरिक्त नहीं ह, अतएव तन्मात्रादि जगत्‌ भी चित्‌ ही हे । उसमें द्वित्व ओर एकत्व कहाँ हैं भाव यह कि जब द्वितीय हो, तब द्वित्व रहे, द्वित्व के अभाव में व्यावर्त्य न होने के कारण एकत्व भी नहीं हे