Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
यो यद्विलासस्तस्मात्स न कदाचन भिद्यते ।
अपि सावयवं तस्मात्कैवानवयवे कथा ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अनुमान में व्याप्ति आदि की सिद्धि के लिए उदाहरण (रष्टान्त) आदि दिखलाते हैं ।
जो वस्तु जिस वस्तु की विलास (विकार) होती है, वह उससे कभी भी भिन्न नहीं होती,
अवयवयुक्त जल आदि के कार्य तरंग आदि में भी ऐसा देखा गया है, फिर निरवयव चित् के
कार्य में तो कहना ही क्या है ? वहाँ तो अवश्य ही ऐसा है, यह भाव है