Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
चितेश्चित्त्वं जगद्विद्धि नाजगच्चित्त्वमस्ति हि ।
अजगत्त्वादचिच्चित्स्याद्भानाद्भेदो जगत्कुतः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
यों जगत् के चिन्मय (चैतन्यमय) होने पर जगत् चिति का धर्म ही सिद्ध होता है, ऐसा
कहते हैं।
हे रामजी, चिति का धर्म जो चितित्त्व है, उसीको आप जगत् जानिये, चितित्त्व (चिद्धर्म)
जगत् से अतिरिक्त नहीं है । यदि चितित्त्व को जगत्त्व से भिन्न मानो, तो चिति अचित्
(चित् से भिन्न) हो जायेगी । भाव यह कि अपने धर्मभूत चितित्त्व को (जगत् को) प्रकाशित
करने के कारण ही उसका नाम चिति पड़ा है । यदि चितित्व जगत्व न माना जायेगा, तो
उक्त प्रयोजन के अभाव में वह चिद् से भिन्न कही जायेगी । इस प्रकार चित् ओर चितित्त्व
का (जगत् का) कल्पनारूप ज्ञान से भेद है, वास्तव में कोई भेद नहीं है, ऐसी परिस्थिति
में जगत् कहाँ से होगा ?