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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

दृश्ये मूर्ते ज्ञसंरूढे विकारादि पृथग्भवेत् । नामूर्ते तज्ज्ञकचिते चित्खे सदसदात्मनि ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह न जानने से ही द्वैतवादी इस विषय में वादविवाद करते हैं, पर हम लोगों को इसमें विवाद नहीं है, ऐसा कहते हैं । जैसे अपने भ्रम से (भ्रान्ति से) औरों को भ्रम में डाल रहे लोग विवाद करते हैं (०७) वैसे ही अद्वितीय अखण्ड चितूघन परमात्मा के विषय में भ्रान्त द्वैतवादी वाद-विवाद करते हैं, परन्तु हम लोग तो भ्रमरहित हो गये है, अतएव हमारे लिए विवाद का अवसर ही कहाँ है ॥ ६ १॥ अज्ञ और अभिज्ञ लोगों की दृश्य प्रपंच के विषय में जो मूर्त (साकार) ओर अमूर्त भावना है, उसीसे उसमें सत्यत्व ओर असत्यत्व से उत्पन्न द्वैत और अद्वैत भेद है अथात्‌ आत्मज्ञानी दृश्य को, स्वप्न की भाँति अमूर्त होने के कारण, असत्य मानते हैं, अत: उनकी दृष्टि में अद्वैत है और अज्ञानी उसे मूर्त देखने के कारण सत्य समझते हैं, अतः उनकी दृष्टि में द्वैत है, ऐसा कहते हैं। अज्ञ लोगों की दृष्टि से मूर्त प्रतीत होनेवाले अतएव सत्य दृश्यमें विकार आदि द्वैतकी प्रतीति होती है, आत्मज्ञानी की दृष्टि से अमूर्तं (निराकार) अतएव स्वतः असत्य चिदाकाशरूपी दुश्यमें विकार आदि द्वैत की प्रतीति नहीं होती है