Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
स्वविचित्ररसोल्लासा चिज्ज्योत्स्ना सततोदिता ।
स्वयं चिदेव प्रकटश्चिदालोको महात्मकः ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण जगत् को आह्वादित करनेवाला चन्द्रमा भी वह स्वयं ही हुई, ऐसा कहते है ।
सदा उदित चिति ही स्वयं अपने विचित्र रसवाले उल्लासो से (पृथिवी में होनेवाले ओषधरस
भी चन्द्रमा के ही अधीन है, अतएव उन उल्लासो से) युक्त चाँदनी (चन्द्रमा) ओर महान्
चिदालोकरूपी प्रकट तेज भी हुई