Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 14, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
स्वयं स्पन्दितयास्पन्दिचित्त्वाच्चिति महानभ ।
चित्प्रकाशप्रकाशो हि जगदस्ति च नास्ति च ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो बात पहले ऊपर कही जा चुकी है, उसीको संक्षेप में कहते हैं ।
चिन्मय ब्रह्म ही अविचारदशा में स्पन्दस्वभाव (श्वासोच्छरास क्रिया करनेवाले) प्राण आदि
में आत्मत्व की कल्पना करने पर यानी अज्ञानवश स्पन्दस्वभाव प्राण ही मैं हूँ, ऐसी कल्पना
करने पर संसारी होता है । विचार करने से जब मैं चित् ही हूँ, यों चित्ता का उदय हो जाता है,
तब अपने स्वभावभूत चित् में ही स्थित होता है