Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 17, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तच्चिदाकाशकोशात्म चिदाकाशैकभावनात् ।
अविद्यमानमप्याशु दृश्यतेऽथानुभूयते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त चिदाकाश ही अपना आवरण करनेवाले अज्ञान से संकलित होकर जव प्रतीत होता
है, तब वही मिथ्याभूत जगत्-रूपसे शीघ्र दिखलाई देता है, वही दुःख आदिका अनुभव
करता है, ऐसा कहते हैं।
तुमने जो अपने पति के रहने का स्थान आदि पुछा है, वह वस्तुतः चिदाकाश कोशरूप ही
है, उससे अतिरिक्त नहीं है अतः चिदाकाश का एकाग्र मन से जब चिन्तन किया जाता है,
तब पृथक् विद्यमान न होता हुआ भी वह यहींसे शीघ्र दिखाई देता है और वहाँ जाकर उसका
अनुभव भी किया जाता है