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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 15–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 17, verses 15–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 15-21

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा सा ययौ देवी दिव्यमात्मीयमास्पदम् । लीला तु लीलयैवासीन्निर्विकल्पसमाधिभाक् ॥ १५ ॥ तत्तत्याज निमेषेण सान्तःकरणपञ्जरम् । स्वदेहं खमिवोड्डीना मुक्तनीडा विहंगमी ॥ १६ ॥ ददर्श खस्था भर्तारं तस्मिन्नेवालयाम्बरे । संस्थितं पृथिवीपालमास्थाने बहुराजनि ॥ १७ ॥ सिंहासने समारूढं जयजीवेति संस्तुतम् । प्रस्तुतं मण्डलानीककार्यमाहर्तुमादृतम् ॥ १८ ॥ पताकामञ्जरीकीर्णराजधानीगृहस्थितम् । पूर्वद्वारस्थितासंख्यमुनिविप्रर्षिमण्डलम् ॥ १९ ॥ दक्षिणद्वारगासंख्यराजराजेशमण्डलम् । पश्चिमद्वारगासंख्यललनालोकमण्डलम् ॥ २० ॥ उत्तरद्वारगासंख्यरथहस्त्यश्वसंकुलम् । एकभृत्यविनिर्णीतदक्षिणापथविग्रहम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

श्री वसिष्टजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, ऐसा कह कर सरस्वती देवी अपने दिव्य लोक को चली गई ओर लीला को वर के प्रभाव से अनायास ही निर्विकल्प समाधि लग गई | जैसे चिड़िया अपने घोंसले को छोडकर आकाश में उड़ जाती हे वैसे ही उसने लोहे के पिंजडे के समान दुर्भेद्य अन्तःकरण के साथ अपने स्थूल देहका त्याग कर दिया । (८) रानी ने निर्विकल्प समाधि द्वारा चिदाकाशमें स्थित होकर अपने अन्तःपुर के प्रासाद के उस आकाश में ही अपने पति मृत महाराज को देखा । वह अपनी वासना ओर कर्मो के अनुसार शरीर, घर आदि सम्पत्ति से सम्पन्न था, अनेक राजाओं से सुशोभित सभामण्डपमें सिंहासन पर आरूढ था, बन्दीगण “आपकी जय हो", “आप चिरंजीव हों” कहकर उसकी स्तुति कर रहे थे, वह उपस्थित राज्य और सेना का कार्य करने में व्यस्त हो रहा था, पताकाओं से व्याप्त राजधानी के जिस सुन्दर घर में राजा बैठा था, उसके पूर्व दरवाजेपर असंख्य मुनि और श्रेष्ठ ब्राह्मण स्थित थे, दक्षिण दरवाजे पर असंख्य राजा- महाराज थे, पश्चिम दरवाजे पर असंख्य स्त्रियाँ थीं, उत्तर दरवाजे पर असंख्य रथ, हाथी ओर घोड़ों की भीड़ लगी थी । राजा ने एक गुप्तचर की जवानी दक्षिण देश के युद्ध की गति- विधिका निर्णय किया