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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 17, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

षट्पदश्रेणिनयना समाकर्ण्येति बन्धुभिः । सा समाश्वासितागत्य पयोभिरिव पद्मिनी ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाशवाणी का उक्त वचन सुनकर जैसे जलके सूख जानेसे मुर्झा रही कमलिनीको नई वृष्टिका जल तसल्ली देता है, वैसे ही भ्रमरोके सदुश नेत्रवाली रानी लीलाके पास आकर उसके बन्धु -बान्धवोँने उसे धैर्य दिया