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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verses 1–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 18, verses 1–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 1-8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्थं विनोदयामीदं दुःखदं चित्तमित्यलम् । बोधयित्वेङ्गितैर्भूपानास्थानादुत्थिताथ सा ॥ १ ॥ प्रविश्यान्तःपुरं भर्तुः पार्श्वेऽन्तःपुरमण्डपे । विवेश पुष्पगुप्तस्य चिन्तयामास चेतसा ॥ २ ॥ अहो विचित्रा मायेयमेतेऽस्मत्पुरमानवाः । बहिरन्तरवद्देशे तत्र चेह च संस्थिताः ॥ ३ ॥ तालीतमालहिंतालमालिता गिरयोऽप्यमी । यथा तत्र तथेहापि बत मायेयमातता ॥ ४ ॥ आदर्शेऽन्तर्बहिश्चैव यथा शैलोऽनुभूयते । बहिरन्तश्चिदादर्शे तथा सर्गोऽनुभूयते ॥ ५ ॥ तत्र भ्रान्तिमयः सर्गः कः स्यात्कः पारमार्थिकः । इति पृच्छामि वागीशामभ्यर्च्योक्तमसंशयम् ॥ ६ ॥ इति निश्चित्य तां देवीं पूजयामास सा तदा । ददर्श च पुरः प्राप्तां कुमारीरूपधारिणीम् ॥ ७ ॥ भद्रासनगतां देवीमुपविश्य पुरोगता । परमार्थमहाशक्तिं लीलाऽपृच्छद्भुवि स्थिता ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, “अत्यन्त दुःखदाय इस चित्त को इस प्रकार बहला रही हूँ”, यों ईशारे से राजाओं को अपना अभिप्राय समझा कर रानी लीला सभाभवन से उठ गई । अन्तःपुर में जाकर अन्तःपुर के प्रासाद में फूलों से आच्छन्न अपने पति के पास पहुँची और विचार करने लगी : अहो, यह बड़ी विचित्र माया है, ये हमारे पुरवासी मनुष्य समाधि में देखे गये प्रदेश में और बाहर अवकाशयुक्त हमारे नगर में भी स्थित हैं । ताल, तमाल आदि वृक्षों से व्याप्त ये पर्वत भी जैसे वहाँ दिखाई दे रहे थे, वैसे ही यहाँ भी दिखाई दे रहे हैं, आश्चर्य, यह किसी ने माया फैला रक्खी हे । जैसे पर्वत दर्पण में भीतर और बाहर भी प्रतीत होता है, वैसे ही चित्तरूपी आदर्श में भीतर और बाहर भी यह सृष्टि प्रतीत हो रही है। इनमें कौन भ्रान्तिमयी सृष्टि है तथा कौन वास्तविक सृष्टि है ? इस सन्देह को मैं, सरस्वती देवी से, उनकी पूजा करके यों पूछती हूँ जैसे कि सन्देह बिलकुल न रहे । ऐसा निश्चय करके लीला ने सरस्वती देवी की पूजा की और तुरन्त ही सरस्वती देवी को कुमारी रूप में अपने सामने उपस्थित देखा । सिंहासन पर वैठी हुई परमार्थ महाशक्तिरूप देवी के सन्मुख होकर लीला ने भूमि पर बैठ कर देवी से पूछा

सर्ग सन्दर्भ

सत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग समाधि में देखी गयी सृष्टि और पहले की सृष्टि दोनों दृश्य होने के कारण समानरूप से मिथ्या हैँ चिन्मात्र ही सत्य हैँ |