Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 18, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
वद तद्भर्तृसर्गस्य किं पृथ्व्यादिषु कारणम् ।
तद्भूमण्डलतो भूतिर्जाता तत्र वरानने ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
तुम्हारे पतिदेव की जो वासनामय सृष्टि है, उसमें तो असाधारण कारण से विलक्षणता
की कल्पना की नहीं जा सकती, क्योकि दोनों समानरूप से माया, काम, कर्म और वासनामूलक
हैं, इस अभिप्राय से कहती हैं।
हे सुन्दरी, प्रत्यक्ष दीख रही इस सृष्टि के अन्तर्गत पृथिवी आदि में से तुम्हारे पति की
सृष्टि का कारण क्या है ? उसे कहो, जिससे कि उसमें विलक्षणता आये ? भौतिक पदार्थों की
बीज से इस भूमण्डलसे उत्पत्ति हुई है, वैसे ही उस भूमण्डल से उत्पत्ति हुई है, अत: भौतिक
पदार्थों में भी कोई विलक्षणता नहीं है