Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 18, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 18, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
स्मृतिराकाशरूपा च यथा तज्जस्तथैव ते ।
भर्तुः सर्गोऽनुभूतोऽपि स व्योमैव तथाबले ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, तब तो पहले जन्म में देखी
गई सृष्टि के संस्कार द्वारा तुम्हारे पतिकी सृष्टि हुई । संस्कार से उत्पन्न ज्ञान को स्मृति कहते
हैं, उसमें विषय सामने नहीं रहता, पुरोवर्ती विषयसे शून्य होने के कारण स्मृति शून्यरूपा है,
वैसे ही तुम्हारे पतिकी सृष्टि भी शून्यरूप ही ठहरी, क्योंकि वह भी स्मृति के सदृश पूर्व सृष्टि
के संस्कार से जन्य है