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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 2, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

यम उवाच । न कदाचन जातोऽसौ न च नास्ति कदाचन । द्विजः केवलविज्ञानभामात्रं तत्तथा स्थितः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि अन्य जीव भी तो इसके व्यष्टिरूप ही हैं, फिर वे कैसे मृत्यु से गृहीत होते हैं ? इस पर कहते हैं। जिस जीव का पृथिवी आदि से रचित देह ही मैं हूँ ऐसा निश्चय है, वह मूढ़ पार्थिव देह ही होता है, यह ब्रह्मा जिस समय सत्यसंकल्पबुद्धि से मृत्यु की कल्पना करेगा, उसी समय तुम उसको पकड़ सकते हो । पृथिव्यादिमय देहका ग्रहण न करने से यह आकाशज ब्राह्मण देहवान्‌ (आकारवान्‌) नहीं हे, अतएव जैसे आकाश कैसी ही मजबूत रस्सी क्यों न हो नहीं बाँधा जाता, वैसे ही इसका भी ग्रहण किया ही नहीं जा सकता ॥ ३२, ३ ३॥ विकाररहित शून्य का विकार, अजका जन्म एवं सत्‌ परथिवी आदि की असत्ता कही, उसको असंभाव्य समझता हुआ मृत्यु बोला । भगवन्‌, शून्य से अज की (अजन्मा की) कैसे उत्पत्ति होती है, यह बात मुझे समझाइए तथा पृथिवी आदि कैसे हैं ? नहीं हैं तो कैसे नहीं हे, यह भी आप मुझे समझाइए ॥ ३ ४॥ परब्रह्म को आकाश कहा गया है ओर पृथिवी आदि की जो असत्वोक्ति है, वह शून्यता के अभिप्राय से नहीं है, किन्तु कार्य की कारण से पृथक्‌ सत्ता नहीं है, इस अभिप्राय से है ओर इसी प्रकार अजका जन्मकथन विवर्त के अभिप्राय से है, परिणाम के अभिप्राय से नहीं है, इस आशय को सूचित करते हुए यमराज बोले : यह आकाशज ब्राह्मण न कभी उत्पन्न हुआ और न कभी विनष्ट हुआ । चूँकि यह ब्राह्मण परमार्थरूप से केवल प्रकाशात्मक विज्ञानस्वरूप है, इसलिए यह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, कभी विकृत नहीं होता