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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 43–45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 2, verses 43–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 43-44

संस्कृत श्लोक

कुतः किलात्र पृथ्व्यादेः कीदृशः संभवः कथम् । एतदाक्रमणे मृत्यो तस्मान्मा यत्नवान्भव ॥ ४३ ॥ ग्रहीतुं युज्यते व्योम न कदाचन केनचित् । श्रुत्वैतद्विस्मितो मृत्युर्जगाम निजमन्दिरम् ॥ ४४ ॥ श्रीराम उवाच । ब्रह्मैष कथितो देवस्त्वया मे प्रपितामहः । स्वयंभूरज एकात्मा विज्ञानात्मेति मे मतिः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ पर चित्स्वभाव वेदनाओं का सहन नहीं होता, वहाँ पर पृथिवी आदि के सहन की संभावना कैसे हो सकती है, इसलिए उस पर तुम्हारे आक्रमण की आशा नहीं है, ऐसा कहते हैं । इसमें पृथिवी आदि का संभव कैसा, कहाँ से और कैसे हो सकता है अर्थात्‌ इसमें पृथिवी आदिका संभव नहीं है, इसलिए हे मृत्यो, तुम इसके ऊपर आक्रमण करने के लिए प्रयत्न मत करो | कोई भी पुरुष कभी भी आकाश को पकड़ नहीं सकता । श्रीयमराज के वचन सुनकर मृत्यु को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह अपने घर लौट गया