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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 2, Verses 50–54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 2, verses 50–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 50-54

संस्कृत श्लोक

यश्चिद्व्योमचमत्कारः किलाकारानुभूतिमान् । स चिद्व्योमैव नो तस्य कारणत्वं न कार्यता ॥ ५० ॥ आकाशस्फुरदाकारः संकल्पपुरुषो यथा । पृथ्व्यादिरहितो भाति स्वयंभूर्भासते तथा ॥ ५१ ॥ निर्मले व्योम्नि मुक्तालीसंकल्पस्वप्नयोः पुरम् । अपृथ्व्यादि यथा भाति स्वयंभूर्भासते तथा ॥ ५२ ॥ न दृश्यमस्ति न द्रष्टा परमात्मनि केवले । स्वयंचित्ता तथाप्येष स्वयंभूरिति भासते ॥ ५३ ॥ संकल्पमात्रमेवैतन्मनो ब्रह्मेति कथ्यते । संकल्पाकाशपुरुषो नास्य पृथ्व्यादि विद्यते ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो चिदाकाश के समान चमत्कारवाला और चिदाकाश के समान अनुभव स्वरूप है, वह चिदाकाश ही है, उसमें न कारणता है और न कार्यता है। आकाश में जैसे इन्द्रनीलमणि से बना औंधा रक्खा हुआ महान्‌ कड़ाही के आकार-सा पदार्थ पृथिवी आदि से रहित प्रतीत होता है और जैसे संकल्प से निर्मित पुरूष पृथिवी आदि से रहित प्रतीत होता है, वैसे ही यह स्वयम्भू (ब्रह्मा) भी पृथिवी आदि से रहित प्रकाशित होता है । जैसे निर्मल आकाश में मोती की माला एवं संकल्प और स्वप्न में नगर पृथिव्यादि रहित ही प्रकाशित होते हैं, वैसे ही स्वयंभू पृथिव्यादि रहित ही प्रकाशित होता है । केवल परमात्मा में न दृश्य है और न द्रष्टा है, केवल चिन्मात्रस्वभावता ही है तथापि यह स्वयम्भू नाम से प्रकाशित होता है । यह संकल्पमात्र मन ही ब्रह्मा कहा जाता है, यही संकल्पाकाश पुरुष ब्रह्मा है, इसमें पृथ्वी आदि विद्यमान नहीं हैं