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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 20, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

तस्मिन्नस्मिन्पुरे तन्वि तदेव सदनं स्थितम् । तस्मात्किं त्रसरेण्वन्तर्जगद्वृन्दमिव स्थितम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे गर्भा से खच्चरी के पेट का विनाश हो जाता है वैसे अनेक सर्गो में उत्पन्न होने से ब्राह्मण के उक्त घर के विनाश की शंका नहीं करनी चाहिये, ऐसा कहती है । उस ब्राह्मण के घर के अन्दर इस सृष्टि के उत्पन्न होने पर भी वह घर अभी ज्यों का त्यों बना ही है, विनष्ट नहीं हुआ । उस विप्रगृह के उदाहरण से आश्चर्य के लिए कौन स्थान है, क्योंकि त्रसरेणु के अन्दर भी जगत्‌-समुदाय स्थित-सा हे । स्थित-सा" यह कथन मिथ्या होने के कारण त्रसरेणु के अन्दर जगत्‌ का रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, यह दशनि के लिए हे