Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 20, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
एष ते कथितः सर्वः प्राक्तनः संसृतिक्रमः ।
भ्रान्तिमात्रकमाकाशमेवं जीवस्वरूपधृक् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त कथा का उपसंहार कर रही देवीजी समाधि दुष्ट सृष्टि ओर इस सृष्टि के समान
पहले की और सृष्टियाँ भी भ्रम ही हैं, ऐसा कहती है ।
मैंने तुम्हारे पूर्वजन्म का सम्पूर्णं सृष्टिक्रम कहा, उसका ब्रह्म का जीव भाव भ्रम ही मूल
है, अतएव भ्रम मूलक होने से वह भ्रान्तिमात्र ही है यानी ब्रह्म का जीवभाव भ्रम से अतिरिक्त
नहीं हे