Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 20, Verses 7–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 20, verses 7–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 7-12
संस्कृत श्लोक
लीलोवाच ।
देवि भोस्त्वद्वचो मिथ्या कथं संपन्नमीदृशम् ।
क्व विप्रजीवः स्वगृहे क्वेमे वयमिह स्थिताः ॥ ७ ॥
तादृग्लोकान्तरं सा भूस्ते शैलास्ता दिशो दश ।
कथं भान्ति गृहस्यान्तर्मद्भर्ता येष्ववस्थितः ॥ ८ ॥
मत्त ऐरावतो बद्धः सर्षपस्येव कोटरे ।
मशकेन कृतं युद्धं सिंहौघैरणुकोटरे ॥ ९ ॥
पद्माक्षे स्थापितो मेरुर्निगीर्णो भृङ्गसूनुना ।
स्वप्नाब्दगर्जितं श्रुत्वा चित्रं नृत्यन्ति बर्हिणः ॥ १० ॥
असमंजसमेवैतद्यथा सर्वेश्वरेश्वरि ।
तथा गृहान्तः पृथिवी शैलाश्चेत्यसमञ्जसम् ॥ ११ ॥
यथावदेतद्देवेशि कथयामलया धिया ।
प्रसादानुगृहीते हि नोद्विजन्ते महौजसः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
लीला ने कहा : आपका वचन तो सत्य है, वह
इस प्रकार विरुद्ध कैसे हुआ ? कहाँ ब्राह्मण का जीव अपने घर में है और कहाँ इतने बड़े
विशाल प्रदेश में हम लोग स्थित हैं यानी वे दम्पती हम कैसे हो सकते हैं ? वैसा यह दूसरा
लोक, वह विस्तृत भूमि, वे विशाल पर्वत, वे दसों दिशाएँ, जिनमें मेरे स्वामी स्थित हैं, कैसे
घर के अन्दर प्रतीत हो सकता है ? सरसों के भीतर मदोन्मत्त ऐरावत हाथी बोधा गया,
परमाणु के भीतर मच्छर ने सिंहों के झुण्ड के साथ युद्ध किया, कमलगडे के अन्दर मेरु स्थापित
है और भँवरें के बच्चे ने उसे निगल लिया, स्वप्न के मेघ की गर्जना को सुनकर मयूर बड़ा
विचित्र नाच करते हैं, इत्यादि कहना जैसे असमंजस है, वैसे ही हे देवेशि घर के अन्दर पृथ्वी
लोक और पर्वत हैं, यह कहना भी असमंजस है । हे देवि, जिस प्रकार से इसकी उपपत्ति हो,
वैसा हम से निर्मल बुद्धि से कहिए, क्योकि अपने प्रसाद से अनुगृहीत जनों की बड़े लोग कभी
उपेक्षा नहीं करते