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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 3–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 21, verses 3–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 3-6

संस्कृत श्लोक

नानुभूतं न यद्दृष्टं तन्मया कृतमित्यपि । तत्क्षणात्स्मृतितामेति स्वप्ने स्वमरणं यथा ॥ ३ ॥ भ्रान्तिरेवमनन्तेयं चिद्व्योमव्योम्नि भासुरा । अपकुड्या जगन्नाम्नी नगरी कल्पनात्मिका ॥ ४ ॥ इदं जगदयं सर्गः स्मृतिरेवेति जृम्भते । दूरकल्पक्षणाभ्यासविपर्यासैकरूपिणी ॥ ५ ॥ नानुभूतानुभूता च ज्ञप्तिरित्थं द्विरूपिणी । पूर्वकारणरिक्तैव चिद्रूपैव प्रवर्तते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

मायिक स्मरणाभास और अनुभवाभास में प्रसिद्ध स्मरण और अनुभव से विलक्षणता दशति हैं। जो वस्तु कभी अनुभूत नहीं है और जो दृष्टिगोचर नहीं हुई है, वह भी स्वप्न में अपने मरण की नाई मुझसे अनुभूत है ओर दृष्ट है, इस प्रकार तुरन्त स्मरण में आती हे । मायाकाश में प्रकाशमान आवरणरहित यह जगत्‌-नामक कल्पनारूप नगरी निःसीम भ्रान्ति ही है । वासना ही यह जगत्‌, यह सृष्टि, इस प्रकार विलास को प्राप्त होती है, समीप में स्थित ओर वर्तमान कालिक में यह दूरस्थित और भूतकालीन है, यों देश और काल के विप्रकर्षरूप से ओर सनातन और निष्क्रिय में क्षण, उनकी आवृत्तिरूप घडी, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास और वर्ष आदिरूप से विपयसि (भ्रम) ही उक्त वासनाका केवल एकमात्र स्वरूप है । इस प्रकार ज्ञान अननुभूत ओर अनुभूतरूप से दो प्रकार का है, वह पूर्वकारणों से रहित ही ओर चिद्रूप ही प्रवृत्त होता हे