Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अवबोधघनाभ्यासाद्देहस्यास्यैव जायते ।
संसारवासनाकार्श्ये नूनं चित्तशरीरता ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि वस्तु का स्वभाव, जो कि लोकसिद्ध है, विपरीत नहीं हो सकता, तो वासनाओं के
क्षीण होने पर भी इस स्थूलदेह की आतिवाहिकता की सम्भावना नहीं की जा सकती, ऐसी
शंका कर श्रीदेवीजी कहती हैं।
ज्ञान के प्रचुर अभ्यास से सांसारिक वासनाओं का विनाश होने पर यही स्थूल देह चित्तशरीर
यानी आतिवाहिक शरीर हो जाती है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है