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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । यद्येन क्रियते किंचिद्येन येन यदा यदा । विनाभ्यासेन तन्नेह सिद्धिमेति कदाचन ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मनोरथ से कल्पित पुरुष में जीवन ओर मरण असत्य ही हे । भाव यह कि संकल्पकल्पित पुरुष ही जव वास्तविक नहीं हे, तब उसके मरण और जीवन की वास्तविकता की क्या कथा है ? वैसे ही बेटी उस शरीर में भी मरण और जीवन अवास्तविक ही प्रतीत होते हैं | २०॥ लीला ने कहा : देवी, आपने मुझे उस निर्मल ज्ञान का उपदेश दिया है, जिसके श्रवणमात्र से ही दृश्य रूपी महामारी शान्त हो जाती हे । माँ, इस विषय में मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये, कृपया यह बतलाइए कि वह अभ्यास कौन है (उसका क्या स्वरूप है) और कैसा है (उसका क्या लक्षण है) तथा किस प्रकार पुष्ट होता हे ओर उसके पुष्ट होने पर क्या होता है ?॥२१.२२॥ श्रीदेवीजी ने कहा : वत्से, जो भी प्राणी जब जब भी, किसी कार्य को करता है, अभ्यास के बिना कभी सिद्ध नहीं होता । भाव यह कि अभ्यासकी प्रत्येक कर्म में आवश्यकता हे