Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अत्यन्ताभावसंपत्तौ ज्ञातृज्ञेयस्य वस्तुनः ।
युक्त्या शास्त्रैर्यतन्ते ये ते ब्रह्माभ्यासिनः स्थिताः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
दृढ़ वैराग्य आदि उसके लक्षण हैं, यह बात विरक्त पुरुषों की स्तुति द्वारा कहते हैं।
म् उसका चिन्तन करने, उसकी चर्चा करने ओर आपस में उसी का बोधन करने से असंभावना की निवृत्ति
होती है और सदा उसी में परायण रहने से विपरीत भावना की निवृत्ति होती है, ये अभ्यास के फलहे ।
जो विरक्त महात्मा पुरुष मुक्ति के लिए अपने अन्तःकरण में यत्नपूर्वक विषय वासनाओं
के क्षय की भावना करते हैं (अपने अन्तःकरण में विषयवासनाओं का जैसे विनाश हो, वैसा यत्न
करते हैं), वे पृथिवी में सर्वश्रेष्ठ हैं और उन्हींका जन्म सफल है । उदारतारूपी (सम्पूर्ण
सामग्रीपरित्यागरूपी) सुन्दरता से एवं वैराग्य रस से सम्पन्न अतएव सदा आनन्द की वृष्टि
करनेवाली बुद्धि जिन पुरुषों मे उत्पन्न हुई है, वे सर्वश्रेष्ठ अभ्यासी (अभ्यासवाले) हैँ ॥ २५.२६॥
श्रवण आदि में निरत होना भी ज्ञानाभ्यास का लक्षण है, ऐसा कहती है ।
जो लोग युक्ति से यानी प्रमाणतत्त्व के निर्धारण के अनुकूल तथा प्रमेयतत्त्व के निर्धारण
के अनुकूल युक्ति से और अध्यात्म तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों से ज्ञाता ओर ज्ञेय
वस्तु के अत्यन्त अभाव की प्राप्ति में (वाध में) यत्न करते हैं, वे ब्रह्माभ्यासी हे