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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 22, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 22, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम । स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

वत्से, जैसे शरद्‌ ऋतु में हिम के समान शीतल ओस के सेंक से कुहरा बिलकुल विनष्ट हो जाता है, वैसे ही चित्त में पूर्वोक्त रीति से अभ्यस्त, सम्पूर्ण तापों (त्रिविध तापों) की शान्ति के हेतु होने से बरफ के समान शीतल विवेकबोध रूपी जल के निरन्तर सिंचन से संसाररूपी कृष्ण पक्ष की (अन्धेरी) रात्रि में उत्पन्न हुई मोहरूपी गाढ़ नींद निवृत्त हो जाती है ॥ ३ २॥ महर्षि वाल्मीकिजी के इतनी कथा कह चुकने पर दिन बीत गया, सूर्य भगवान्‌ अस्ताचल शिखर की ओर अग्रसर हो गये ओर भरद्वाज आदि मुनियों की सभा वाल्मीकिजी को प्रणाम कर सायंकाल के सन्ध्या-वन्दन आदि कृत्यके लिए स्नानार्थ चली गई एवं रात्रि बीतने पर सूर्य के उगते-उगते मुनि-मण्डली सभास्थान में आ गई