Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 23, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
स्वभावकेवलं शान्तं स्त्रीद्वयं तद्बभूव ह ।
चन्द्रार्कादिपदार्थौघैर्दूरमुक्तमिवाम्बरम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
देवी सरस्वती का ज्ञानदेह है, उसीसे वे विचरण कर सकती थीं, फिर उन्हें समाधिस्थ क्यों
होना पड़ा, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लीला को समाधि सिखलाने के लिए वह समाधिस्थ
हुई थी । उक्त योग गुरु के सिखाये बिना प्राप्त नहीं हो सकता, अतः लीला के समाधिस्थ होने में
सहयोग हो, इसलिए देवीजी ने समाधि ली ।
दृश्य का अस्त होने पर वे कैसे नहीं, इस शंका पर श्रीवस्रिष्ठजी कहते हैं।
सूर्य, चन्द्रमा, तारे आदि सम्पूर्ण पदार्थों से अत्यन्त शून्य केवलमात्र आकाश सृष्टि के
आरम्भ में यानी वायु की उत्पत्ति से पूर्व और प्रलयकालके आने पर (वायुपर्यन्त पदार्थों का
प्रलय होने पर) जैसे केवलस्वभाव से स्थिर रहता है, वैसे ही वे दोनों अंगनाएँ दर्शन से विमुक्त
शान्त और केवल स्वभाव हुई